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Friday, May 20, 2011

दो कबिता - दिसम्बर २००६



कविता - १

पल पल मरती हूँ , एक पल जीने की चाह में ,

दिल विल देती हूँ , थोड़ा सा प्यार पाने के आस में ...




हर कोई साथ छोड़ जाते हैं ,
जाने किसकी राह ताकती रहती हूँ ...




कोई तो देख ले हमें एक नज़र ,
इस आस में , अपनी कब्र पे खुद
फूल सजाती रहती हूँ ...




कविता -


गुज़र रही है कुछ इस तरह से ..ज़िंदगी
दिल में आग का दरिया है
लबों पे मुस्कान सजाए रहतें हैं ..




कभी तो आयेगी इस रागिस्थान में भी हरियाली ...

वो बारिश जो मेरी रग रग को भिगो दे

उसकी राह ताकते रहते हैं ||


समय समय की बात है -

कभी दिल तो कभी ये ऑंखें रोते हैं ,



पर सितम ये ...

कितना भी रोले कोई - इस रेत की प्याश नहीं बुझती ..

दिल की आग ठंडा नहीं पड़ता ..


और लबों में cactus के फूल खिलते रहरे हैं ..